आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ख्वाब और हकीकत

                
                                                         
                            ख्वाब, कल्पना के एक इंद्रधनुषी सपने हैं,
                                                                 
                            
जबकि इसका टूटना हकीकत की एक पहचान है।

ख्वाब सजाए थे आसमान की बुलंदियों को छूने के,
हकीकत देखी है नसीब पर होने की।

तकदीर ने ऐसे रुखसत किया
कि खामोश होकर रह गई,
दिल तो छूना चाहा आसमान की बुलंदियों को,
मगर पैर मजबूरियों की जंजीर में बँध गए।

दर्द की दीवानगी ने ऐसी कसक ढाई है
कि आँसुओं की मेहरबानी भी हमसे दूर भागी है।

जब अपनों ने दर्द दिया
तो आँसू बहाना छोड़ दिया,
दिल तड़प-तड़प कर रह गया,
आशियाना बनाना छोड़ दिया।

हालात कुछ ऐसे हुए
कि सपनों को छोड़ना पड़ा,
फ़र्ज़ की तराजू पर
ज़िंदगी को तौलना पड़ा।

सुख-दुख के इन पलड़ों पर
दुख की ही तौल प्रखर रही,
मुस्कान के प्रतिक्षण आलिंगन से भी
धर्मकाँटा में न समरसता रही।
— मुनुचंदा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
42 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर