मैं सौभद्र, पार्थनंदन,
वर्ची का अवतार मैं,
उत्तरा के जीवन का,
अमर दिव्य श्रृंगार मैं।
माँ सुभद्रा का लाडला,
अर्जुन का हूँ पुत्र मैं,
भांजा मैं श्रीकृष्ण का,
ऐसा वीरपुत्र मैं।
बलशाली, पराक्रमी,
साहस का हूँ रीढ़ मैं,
चक्रव्यूह को भेद सके जो,
ऐसा सुरवीर मैं।
योगमाया की सारी माया,
चंद्रदेव का अंश मुझमें,
बलराम, श्रीकृष्ण,
श्यामदेव का शिष्य हूँ मैं।
कुरुक्षेत्र के रण में,
वीरगति पाया मैं,
कौरवों की कायरता को,
भूपटल पर लाया मैं।
गुरु की प्रतिष्ठा खातिर,
मृत्यु को गले लगाया मैं,
कर्ण के कहने पर भी,
अस्त्र न गिराया मैं।
बालक मैं अबोध था,
पर युद्ध से निपुण था,
सातों पराक्रमियों के बीच,
मैं अकेला वीर था।
ताऊ मेरे द्वार पर,
पिता मुझसे दूर था,
मामा सब कुछ जानते हुए भी,
नियति के आगे मजबूर था।
माँ के गर्भ में ही मैंने,
सुन रखी कहानी थी,
चक्रव्यूह को कैसे तोड़ें,
यह साजिश मैं न जानी थी।
पर काल की निद्रा,
मेरी माँ के नेत्रों में छाई थी,
अपूर्णता की वह कहानी,
मेरी मौत बनकर आई थी।
क्रूरता की वह चोट,
स्वयं माधव को रुलाया था,
कौरवों की दरिंदगी पर,
सारा आर्यावर्त लजाया था।
वीरता की यह कहानी,
प्रेरणा बनकर आई,
अभिमन्यु की शहादत ने,
यह सीख हमें दिलवाई।
जीवन है एक चक्रव्यूह,
इससे तुम घबराना मत।
अधूरे ज्ञान की कुंजी,
जीवन में अपनाना मत॥
— नूतन झा