क्यूँ छिपाए हुए हो नमी आज तुम दीद में
वक़्त बर्बाद करते क्यूँ हो ज़िक्रे-तम्हीद में
है उदासी का साया यहाँ शहर के हर तरफ़
माह-ए-नौ का तबस्सुम भी गुम है कहीं ईद में
मज़हबी नफ़रतें घुल चुकी हैं फ़िज़ाओं में यूॅं
ढूँढता हूँ मैं ईसार-ओ-उल्फ़त को बकरीद में
चूम कर मौत को जो वतन पर फ़िदा हो गया
नूर उसका रहेगा हमेशा ही ख़ुर्शीद में
दे गया इश्क़ में वो दगा, ये अलग बात है
साँस बाकी है बस उसके आने की उम्मीद में
--निशान्त शुक्ल