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रात

Nisha Devi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रात
        
                                                    
                            

रात भी कुछ अलग - थलग है।

भीड़ - भाड़ और आपाधापी से,
शोरगुल-भागदौड़ भरे जीवन से,
थक कर चूर हुए तन - मन से,
सब जीवों को विश्राम दिया,

रात भी कुछ अलग - थलग है।

लड़ाई झगड़े और मारपीट से,
ताने-उलाहनों और बुरी नजरों से,
चिंता और निराशा भरे जीवन से,
सबको अपने आगोश में लिया,

रात भी कुछ अलग - थलग है।

क्या जात - पात और मजहब,
क्या राजा और क्या रंक,
क्या नारी और क्या नर,
उसके लिए सब एक बराबर,

रात भी कुछ अलग - थलग है।

भेदभाव न कभी किसी से,
सब को अपने हृदय में स्थान दिया,
ताजगी भरे जीवन के लिए,
सबको निद्रा का वरदान दिया,

रात भी कुछ अलग - थलग हैं।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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