रात
रात भी कुछ अलग - थलग है।
भीड़ - भाड़ और आपाधापी से,
शोरगुल-भागदौड़ भरे जीवन से,
थक कर चूर हुए तन - मन से,
सब जीवों को विश्राम दिया,
रात भी कुछ अलग - थलग है।
लड़ाई झगड़े और मारपीट से,
ताने-उलाहनों और बुरी नजरों से,
चिंता और निराशा भरे जीवन से,
सबको अपने आगोश में लिया,
रात भी कुछ अलग - थलग है।
क्या जात - पात और मजहब,
क्या राजा और क्या रंक,
क्या नारी और क्या नर,
उसके लिए सब एक बराबर,
रात भी कुछ अलग - थलग है।
भेदभाव न कभी किसी से,
सब को अपने हृदय में स्थान दिया,
ताजगी भरे जीवन के लिए,
सबको निद्रा का वरदान दिया,
रात भी कुछ अलग - थलग हैं।
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