अकेले आना-जाना है
यह दुनिया एक भीड़ का मेला,
सुख - दुख इसका खेला है।
क्या हारा और क्या जीता है,
इस भ्रम में क्यों जीता है।।
वो अपना है, वो अपना है,
सच मानो सब सपना है।
मतलब के सब रिश्ते - नाते,
खुशी-खुशी सब कहां निभाते।।
भीड़ में सब लगते अपने,
जरूरत में न थे अपने।
सुख में लगते गैर भी अपने,
दु:ख में गैर हुए अपने।।
क्या अपना, क्या बेगाना,
छोड़ यही सब जाना है।
जिंदगी का कारवाँ है,
अकेले आना - जाना है।।
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