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अकेले आना - जाना है

Nisha Devi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अकेले आना-जाना है
        
                                                    
                            

यह दुनिया एक भीड़ का मेला,
सुख - दुख इसका खेला है।
क्या हारा और क्या जीता है,
इस भ्रम में क्यों जीता है।।

वो अपना है, वो अपना है,
सच मानो सब सपना है।
मतलब के सब रिश्ते - नाते,
खुशी-खुशी सब कहां निभाते।।

भीड़ में सब लगते अपने,
जरूरत में न थे अपने।
सुख में लगते गैर भी अपने,
दु:ख में गैर हुए अपने।।

क्या अपना, क्या बेगाना,
छोड़ यही सब जाना है।
जिंदगी का कारवाँ है,
अकेले आना - जाना है।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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