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कुदरत का कहर

Nirmal Thakur

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुदरत का कहर टूट पड़ा है
        
                                                    
                            
प्रकृति का रौद्र रूप दिख रहा है,
खौफ में है ये दुनिया सारी ,
जल प्रलय जान -मान पर पड़ी है भारी ,
आज यहां तो कल वहां,
जहां देखो मचा है कोहराम कभी नेपाल तो कभी भारत में हो रही है तबाही ,
धरती की नैन नक्श बदल रही है ,
भौगोलिक परिवर्तन से धरती की आकार बदल रही है,
कहीं धरती कट रही बट रही है तो ,
कहीं समुद्र का बदल रहा है रूप रेखा,
कहीं पर्वत माला की बर्फ रूपी श्रृंगार उतर रही है जो हमारी भावी जीवन की है संचित अमृत ,
हम सब की दोहन से क्रोधित है प्रकृति ,
छाया है खतरा हर - देश विदेश में,
सुरक्षित नहीं है ये धरती
हम सब के कुकृत्य ने प्रकृति को दिया है ये रौद्र रूप ,
छोटी नदिया का भी विशाल काया पिघलती गलेशियर का पड़ा है काला साया ,
हम सब है इसके जिम्मेवार ,
हमारी आवश्यकता और अविष्कार हीं पड़ी हम सब पर भारी ,
हम सब जो कर रहे है प्रकृति से खिलवाड़ ,
जल जंगल जमीन का कर रहे है शोषण ,
धरती का जो है आभूषण ,
हमसे रूठ रही है प्रकृति
ये जो हो रही जल प्रलय ये प्रकृति का संकेत ,
नंगी आंखो से देख लिया हमने असम की तबाही का झांकी ,
अब कोहराम मची है नेपाल में ,
रसुवा अभी सिसक रही है ,
विनाश के नज़ारा देख हम सब खौफ में है,
चंद मिनट में कितने बसेरा का घर संसार उजड़ गया ,
जहां थी अमन चैन की सांसे वहां मलवे में तबदिल हो गया ,
दिख गई हमारी औकात ,
प्रकृति ने दे दी हमें मात ,
प्रकृति हमसे सब से कहती है ,
छेड़ोगे तो छोड़ेगे नहीं
रूप से कुरूप किया तो अपनो को भी बक्सेंगें नहीं,
सर्तक हो जाव ये है चेतवानी अगर तुने किया मनमानी ,
तो हम भी करेंगें मनमानी खत्म कर देंगे जीवन की कहानी । ॥







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