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सांप-छछूंदर

Nirbhay Trigun

Mere Alfaz
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                            दोनों लोग सूंघते सूंघाते चले हैं
        
                                                    
                            
गली गूचे झाड़ पत्तों में सरसराते चले हैं
मुलाक़ात हो गई दोनों की एक मोड़ पर
खड़े हो गए दोनों एक गोड़ पर
लगे प्रतिष्ठा के नारे लगाने

दोनों एक दूजे को झटका से झटके
एक करे चें चें दूजा उसको लपेटे
कभी ऊपर से नीचे कभी नीचे से ऊपर
एक दूजे को पटके

जनता की आंखें खुली की खुली हैं
अब न्याय होगा कि साहस मिली है
लड़ते लड़ाते यूं ही पांच वर्ष गुजरे
एक सांप एक छछूंदर दोनों कैसे सुधरे
हाल जनता की बुरी किसे घोंटें किसे उगलें

मौका मिलते ही खिसक लिए दोनों
धर्म के पीछे लटक लिए दोनों
फिर पांच वर्ष माल गटक लिए दोनों
अब फिर दोनों सूंघते सूंघाते चले हैं...

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले
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