विज्ञापन

शाम से ही

Niraj Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शाम से ही आँखों मे नमी रहती है
        
                                                    
                            
याद तेरी दरवाजे पे खड़ी रहती है

तुझको देखु या तुझसे बात करूं
हर घड़ी उलझन ये पड़ी रहती है

निकल तो आयें हैं तेरी गलियो से दूर
पर तू अभी भी मुझमे कहीं रहती है

तेरी याद मेरे जहन में इस तरह बसती है
जैसे कोई तश्वीर दीवार से लगी रहती है

जिक्र तुम्हारा सुनकर खो सा जाता हूं
और चाय टेबल पर पड़ी रहती है।

 
2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ramesh Raj

25 कविताएं

View Profile

Junaid Ahmad

5 कविताएं

View Profile

Prasoon Saxena

966 कविताएं

View Profile