शाम से ही आँखों मे नमी रहती है
याद तेरी दरवाजे पे खड़ी रहती है
तुझको देखु या तुझसे बात करूं
हर घड़ी उलझन ये पड़ी रहती है
निकल तो आयें हैं तेरी गलियो से दूर
पर तू अभी भी मुझमे कहीं रहती है
तेरी याद मेरे जहन में इस तरह बसती है
जैसे कोई तश्वीर दीवार से लगी रहती है
जिक्र तुम्हारा सुनकर खो सा जाता हूं
और चाय टेबल पर पड़ी रहती है।
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