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सैलाब के बाद

Nilchitralekha vyas

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मलबे में दबे घरों की चीखें, अब भी दीवारों से रिसती हैं,
        
                                                    
                            
टूटी अलमारी में बची चूड़ियाँ, सूनी कलाइयों को पुकारती हैं।
कहीं काँच की एक किरच में, किसी सुहाग की साँस अटकी है,
कहीं भीगी हुई तस्वीर में, पूरी एक उम्र सिमटी है।
स्कूल के आँगन में उलटे पड़े, नन्हे-नन्हे बस्ते रोते हैं,
जिनमें कल तक सपनों के अक्षर थे, आज कीचड़ में सोते हैं।
भीगी किताबों के पन्ने, अपनी लिखावट पहचानते नहीं,
जिन आँखों में भविष्य था, वे आँखें आज अपना घर जानती नहीं।
सैलाब में डूबे दस्तावेज़, सिर्फ़ काग़ज़ नहीं—पहचानें थीं,
किसी की वर्षों की मेहनत, किसी की जीवन-भर की निशानियाँ थीं।
लहरें बहा ले गईं प्रमाणपत्र, तस्वीरें और घर का पता,
जैसे समय ने एक ही पल में, किसी का पूरा अस्तित्व मिटा दिया।
फिर भी मलबा कुरेदते हाथों में, उम्मीद की थरथराहट है,
टूटी चूड़ियों, भीगे बस्तों में, जीवन की आख़िरी आहट है।
सैलाब बहुत कुछ ले गया—पर एक चीज़ नहीं ले जा पाया,
इन राख हुए सपनों के भीतर, फिर से जीने का साहस छोड़ गया।
-नीलचित्रा व्यास 
एक महीने पहले
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