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Nilchitralekha vyas

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नगर के चौराहों पर
        
                                                    
                            
अब दीवारें नहीं बोलतीं,
बोलते हैं
रंगे हुए आश्वासनों के मुखौटे।
शब्दों के कपोलों पर
विश्वास का चंदन है,
किन्तु उनकी देह से
प्रवंचना की गंध उठती है।
मृगतृष्णाओं ने
जल का रूप धर लिया है,
और प्यासा मनुष्य
रेत को ही सरोवर मान बैठा है।
बाज़ार ने
सत्य का मूल्य नहीं चुकाया,
उसने केवल
उसकी अनुकृति गढ़ ली।
अब दर्पण
प्रतिबिंब नहीं लौटाते,
वे इच्छाओं का
संपादित संस्करण दिखाते हैं।

हर चमक
दीप्ति नहीं होती,
कुछ उजाले
आँखों का अँधकार भी रचते हैं।
विज्ञापन—
यह युग का नवीन मायाजाल है,
जहाँ शब्द
अर्थ से विमुख होकर
केवल आकर्षण की भाषा बोलते हैं।
विश्वास की नदी
धीरे-धीरे सूख रही है,
और उसके तट पर
छल के होर्डिंग
प्रतिदिन ऊँचे होते जा रहे हैं।
हे मनुष्य!
अपने अंतःकरण की अग्नि बचाए रखना,
क्योंकि
जब विवेक बुझ जाता है,
तभी भ्रामक विज्ञापन
सत्य का सिंहासन हथिया लेते हैं।
स्मरण रहे—
सत्य को कभी प्रचार की आवश्यकता नहीं होती;
उसकी आभा
स्वयं प्रमाण बनकर
काल के ललाट पर अंकित हो जाती है।
-नीलचित्रा व्यास
3 महीने पहले
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