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उदासी

Nidhi Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उदासी एक खलिश है
        
                                                    
                            
चुभ रही है मेरे सीने में,
ये धीमा सा ज़हर है जो
चढ़ता जा रहा है बस।

मैं कुछ बोलना चाहूं
तो बस आंसू निकलते हैं,
ये कैसा दर्द है मुझको जो,
बढ़ता जा रहा है बस।

मेरी आंखों के कोरों से,
ये बस बहती ही रहती है,
उदासी बन गई है जोंक,
मेरे अंग अंग में रहती है।

ये हर पल चूसती है खूं,
ओ अपना पेट भरती है।
ये हर पल चांटती है मेद,
मुझे ख़ाली ये करती है।

ये कैसी बन गई है जां,
कि मेरी जां पे बन आयी,
मैं इससे दूर गर जाऊं,
मुझे खाती है तन्हाई।

नहीं ये साथ छोड़ेगी,
ऐसा इसका वादा है,
मुझे मुक्ति दिलाने का,
ही बस इसका इरादा है।

नहीं इससे मुझे नफ़रत,
यही मेरी सहेली है,
ये मेरे संग पूरी है,
ये मेरे बिन अकेली है।

ये जबसे साथ रहती है,
मुझे भाता नहीं है कुछ,
उदासी के सिवा अब तो,
नज़र आता नहीं है कुछ।

मुझे इसने है बतलाया,
कि सब अपने, पराए हैं,
ख़ुदा की ही ये गलती है,
जो सब रिश्ते बनाए हैं।

मगर ये सारे रिश्ते तो,
मुझे छोड़ेंगे जीते जी,
उदासी संग रहेगी बस
मेरे मरने तलक में भी।

मुझे इस पे यकीं है कि,
ये सब वादे निभाएगी,
सताएंगे मुझे जब सब,
ये रोते में हंसाएगी।

बनेगी ये कफ़न मेरा,
जाएगी कब्र में भी संग,
सभी जब लौट जाएंगे,
बिखेरेगी ये अपना रंग।

उदासी एक खलिश है
चुभ रही है मेरे सीने में,
ये धीमा सा ज़हर है जो
चढ़ता जा रहा है बस।

- Nidhi Sharma
(Madhya Pradesh)

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