समाज रूपी सागर में
प्यार की, एक किश्ती को हमने डूबते देखा।
दिल की तन्हाइयों में हमने उन्हें खोते देखा।
प्यार के अनजाने सफर में कसमें,वादे,नेक
इरादे की किश्ती में उनको सवार होते देखा।
अरे उनको हमने
दर दर भटकते और घर से बेघर होते देखा।
नहीं अपनाया नहीं स्वीकारा जब समाज ने
तो डूब
किसी दरिया में हमने उनको जान देते देखा।
समाज रूपी सागर में
प्यार की, एक किश्ती को हमने डूबते देखा।