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चश्मे पकड़वा दिये, हमारी आँखे फोड़कर

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                            आदमी जब शहर पहुंचता है गांव छोड़कर।
        
                                                    
                            
सीख जाता है चलना, अपने पांव मोड़कर।
आंकड़े घटते तो विरोध,बढ़ते है तो विरोध,
कइयों की रोज़ी है ,आंकड़े तोड़ मरोड़कर।
सदैव युवा था,है और रहेगा भी क्योंकि वो,
हर बार हिसाब लगाता है बचपन जोड़कर।
टीवी शो में आप ऊँची- ऊँची छोड़ते रहे हो,
अब बैंकों का रुपया भी लौटा दो दौड कर।
बंटवारे मे एक मुल्क बना,दूसरा धर्मशाला,
चश्मे पकड़वा दिये, हमारी आँखे फोड़कर।
- जयंत दिक्षित
एक महीने पहले
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