हमारे अंदर ही कहीं वो बोल रही थीं
पता नहीं क्या-क्या अपने मन में घोल रही थीं
निश्चय ही मन में क्रांति के गीत वो गा रही थीं
मिलन की बेला फिर से करीब आ रही थीं
हम हवा में कोई ख़्वाब बुन रहे थे
नीले बादल में नीलिमा खिल रही थी
अँधियारा रोशनी कोई बुन रही थी
सुगंध तुम्हारे आने की हवा में फैला रही थी