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जब मैं बैंक जाता हूँ

Neelam Chourasia

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब मैं बैंक जाता हूँ,
        
                                                    
                            
तुम्हें नहीं पाता हूँ,
तो दिल के मेरे सौ टुकड़े हो जाते हैं।

मैं उस आदमी की तरह व्यवहार करता हूँ,
जिसकी कोई चीज़ किसी ने हटा दी हो,
और वह उस चीज़ के हटने पर
रोता है, चिल्लाता है और ज़िद करता है कि—
“मेरी चीज़ वापस वहीं रखो।”

मैं रो भी नहीं पा रहा हूँ,
क्योंकि मैं फ़ैमिली के पास हूँ,
क्योंकि मैं बीमार हूँ।

एक कमरे में बंद होकर
खूब रोना चाहता हूँ,
चिल्लाना चाहता हूँ—
इतनी तेज़ आवाज़ में
कि तुम्हारे तक मेरी आवाज़ पहुँच जाए।

मैं चिल्लाकर कहूँ—
“वापस आ जाओ,
मुझे तुमसे बात करनी है।”

और अगर मेरी बात सुनकर नहीं,
तो मेरा रोना ही सुनकर
तुम वापस आ जाओ।

काश, ऐसा हो पाता।

- नीलम चौरसिया "नील"
2 महीने पहले
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