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आरज़ू मुझे भी थी उसकी ज़ुल्फ़ों में उलझ जाने की,

Naveen Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बड़ी लंबी कहानी थी, वो स्कूल की रंगीन जवानी थी,
        
                                                    
                            
मैं मरता था एक चेहरे पर, वो सूरत बड़ी निराली थी। 

मैं मरता रहा उसकी नादानियों पर,
वो मरती रही अपनी जवानी पर।

आरज़ू मुझे भी थी उसकी ज़ुल्फ़ों में उलझ जाने की,
मगर उसे ख़बर तक न थी मेरी उम्र गुज़र जाने की। 

मैं उसकी ख़ामोशी में भी इश्क़ पढ़ता रहा,
वो मेरी ख़ामोशी की वजह बनकर भी अनजान थी।

दास्ताँ तो दोनों की थी, मगर फ़र्क़ इतना था—
मैंने उसे अपना जहाँ समझा,
 उसकी दुनिया में मेरा ज़िक्र तक गुनाह था। 

 
5 घंटे पहले
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