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कलियुग और कर्ण

Naveen Anandkar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कह दो,
        
                                                    
                            
अनजाने इन संदेशों से,
भटके इन वणिकों के भेषों से,
कलयुग की धुंधली परिपाटी से,
मन के भीतर की थाती से।
शब्दों के चतुर छलावे से,
अंबर के मलीन दिखावे से,
रग-रग में रमती इस थकान से,
छलियों के महा-अनुष्ठान से,
बगुला-भगतों की इस टोली से,
आस्तीन के सर्पों की बोली से।

इस पतझड़ को मधुमास कहें,
अब मेरा अंतिम रास कहें।

टटोल लो इस अंतर्मन को,
सहेज लो शेष इस जीवन को,
मन तरसे जहाँ निष्काम को,
जग जाए जहाँ विश्राम को।
यूँ मिटता मन का ताप नहीं,
बिन चिंतन के होता ज्ञान नहीं,
थक कर महासमर के रण से,
तज दिए शस्त्र हैं अब कर्ण ने।

अब पुनः कोई संधान न होगा,
इससे अधिक वरदान न होगा।
3 महीने पहले
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