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हरसू धुआँ धुआँ हर समां धुआँ धुआं हुआ क्यूँ है

Nathuram Kaswan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            येह फ़िजूल की ख़ाहिशें बेकार के अरमाँ क्यूँ हैं
        
                                                    
                            
हर इक इन्सान यहाँ तसव्वुर ही में परेशाँ क्यूँ है!

हांफती हवाओं से कांपती हैं टहनियां शजर की
बारिश न बिजली बादलों से भरा आस्माँ क्यूँ है!

हर तरफ़ हर मंज़र है परेशान येह माजरा क्या है
इन्सान को देखकर इन्सान इस क़दर हैरां क्यूँ है!

आखिर ये मुसाफ़िरत है कैसी येह सफ़र है कैसा
ठहरा हुआ सहरा में ख़्वाहिशों का कारवाँ क्यूँ है!

हरसू धुआँ धुआँ हर समां धुआँ धुआं हुआ क्यूँ है
मन के आंगन पे झुका आस्माँ धुआँ धुआँ क्यूँ है!
-एन. आर. कस्वाँ
एक महीने पहले
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