फ़िराक़ो-फुर्क़त में हयात गुज़र गई सारी
दिन बेचैन रातें तारे गिन गिन कर गुजारी
इक आँसू टपका जब भीगी आँख हमारी
शबेहिज़्र में भूले सारी हम कौकब शुमारी
-एन आर कस्वाँ