बाड़ खेत को खाने बैठे, किससे गुहार लगाई जाए?
अपने ही जब घर लूटें, किसको व्यथा सुनाई जाए?
रक्षक ही जब भक्षक बन जाएँ, किससे आस लगाएँ हम?
बिकते हुए इन दरबारों में, क्या आवाज़ उठाएँ हम?
जिस उपवन का बाग़बाँ खुद ही, रौंद रहा हो फूलों को,
भूल चुका हो लालच में जो, रखवाली के उसूलों को।
तो भँवरों की चौकीदारी ,
कैसे चमन बचाएगी ?
काँटों की नीयत तो आख़िर, एक दिन सारे फूल गिराएगी।
माली ही जब सौदा कर ले, जाकर के बाज़ारों में,
कलियाँ फिर कैसे महकेंगी, इस गुलशन की बहारों में?
चौकीदार मिला हो जाकर, खुद ही जब चोरों के साथ,
रोगी को जब वैद्य थमा दे, ज़हर की पुड़िया अपने हाथ।
जब पहरेदार ही डाकू हो, किससे घर की आस करें?
जिस चौखट पर पहरा होना था, वहीं खड़े हत्यारे हों।
तो उस घर की सूनी चौखट पर, कैसे दीप जलाए कोई?
जिस घर के रखवाले लुटें, किसको व्यथा सुनाए कोई?
न्याय के मंदिर में बैठा, मुंसिफ़ जब व्यापारी हो,
और वकालत करने वाला, खुद ही एक शिकारी हो।
तोल रहा हो जीवन जब वो, सिक्कों की खनकारों पर,
लगी हो बोली इंसाफ़ की, सत्ता के बाज़ारों पर।
न्यायाधीश ही मांस बेचे, खोल के जब अपनी दुकान—
तो बकरे तारीख़ें लेने, बोलो जाएँ कहाँ श्रीमान?
जब क़ातिल ही मुंसिफ़ हो, और ख़ंजर ही गवाह बने,
जब झूठ खड़ा हो कटघरे में, सच ही दोषी ठहरने लगे।
अर्ज़ी, दलीलें, काग़ज़ सारे, किस काम के रह जाएँगे?
जब फ़ैसले ही बिकने लगें, तो न्याय कहाँ से लाएँगे?
रहम की भीख मत माँगना, इन झूठे दरबारों में,
जहाँ बकरों की खालें टँगी हों, न्याय के गलियारों में।
जब रक्षक के ही हाथों में, भक्षक का हथियार मिले,
और न्याय की कुर्सी पर जब, ज़ुल्म का ठेकेदार मिले।
तो अर्ज़ी और दलीलों के, ये काग़ज़ सब बेकार हैं,
यहाँ बेगुनाहों के हिस्से में, बस सजे हुए बाज़ार हैं।
इस अंधी-गूँगी बस्ती में, अब इंसाफ़ की आस नहीं,
इन बिके हुए दरबारों में, अब बचा कोई विश्वास नहीं।
कब तक बकरे बँधते रहेंगे, इन कसाइयों की चौखट पर?
कब तक ख़ून की कीमत होगी, मुंसिफ़ की हर दस्तख़त पर?
कब तक गर्दन झुकी रहेगी, कब तक आँखें सहती रहें?
कब तक अपने ही हत्यारे, अपना फ़ैसला लिखते रहें?
न्यायाधीश की तराज़ू में, बस गोश्त तोला जाता है,
इन फ़ैसलों की स्याही में, बस लहू घोला जाता है।
जब न्याय की चौखट पर ही, न्याय का सौदा होता हो—
तो बकरा तारीख़ें लेने, किस दरबार में जाता हो?
तारीख़ें कहाँ लें, श्रीमान?
तारीख़ें कहाँ लें, श्रीमान?