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कभी-कभी अपनी महबूबा को

Naresh yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी-कभी अपनी महबूबा को
        
                                                    
                            
कुछ इस तरह सताया करते हैं
उनसे झगड़ा करके, उनके ही सामने
उनकी तस्वीर से बातें करते हुए
तस्वीर चूम लिया करते हैं।

कभी-कभी अपनी महबूबा को
कुछ इस तरह सताया करते हैं
उनके ही सामने, उनकी सहेली की
खूबसूरती की तारीफ करते हुए
लंबी साँसें भरा करते हैं।

कभी-कभी अपनी महबूबा को
कुछ इस तरह सताया करते हैं
उनके ही सामने उनकी परछाईं को
गले लगाकर किसी गैर का नाम लिया करते हैं।

कभी-कभी अपनी महबूबा को
कुछ इस तरह सताया करते हैं
उनके ही सामने फोन पर किसी पराई
लड़की से मीठी मीठी बातें करने का
दिखावा किया करते हैं।

हमारी इन हरकतों से जल भुन जाया करते हैं
कभी-कभी अपनी महबूबा को
कुछ इस तरह सताया करते हैं।


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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