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शेयर बाजार

Nandkumar Bhagwat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रोज नई उम्मीदे लेकर खुलता हैं
        
                                                    
                            
रोज टूटे सपने लेकर बंद होता हैं
भारत का शेयर बाजार भी मुझे
अब मेरे जैसा ही अभागा लगता हैं

सुबह हरे रंग के साथ उछलता हैं
शाम को लाल निशान फहराता हैं
मुनाफा देखकर खुश होने लगता हूं
शाम को घाटे का हिसाब लगाना पड़ता हैं

चाँद को छूने के सपने दिखाकर,
धड़ाम से ज़मीं पर पटकता है।
खेल ज़िंदगी की अनिश्चितता का,
इससे बेहतर कौन जान सकता है।

जैसी भी हो जिंदगी तो जीना हैं
घाटे में ही सही बाजार तो खुलना हैं
आज जिसे हम समझ रहे हैं घाटा
कल वही फायदा साबित हो सकता हैं
-नंदकुमार भागवत
2 महीने पहले
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