रोज नई उम्मीदे लेकर खुलता हैं
रोज टूटे सपने लेकर बंद होता हैं
भारत का शेयर बाजार भी मुझे
अब मेरे जैसा ही अभागा लगता हैं
सुबह हरे रंग के साथ उछलता हैं
शाम को लाल निशान फहराता हैं
मुनाफा देखकर खुश होने लगता हूं
शाम को घाटे का हिसाब लगाना पड़ता हैं
चाँद को छूने के सपने दिखाकर,
धड़ाम से ज़मीं पर पटकता है।
खेल ज़िंदगी की अनिश्चितता का,
इससे बेहतर कौन जान सकता है।
जैसी भी हो जिंदगी तो जीना हैं
घाटे में ही सही बाजार तो खुलना हैं
आज जिसे हम समझ रहे हैं घाटा
कल वही फायदा साबित हो सकता हैं
-नंदकुमार भागवत