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प्रकृति गोद में

NAND KISHOR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आओ
        
                                                    
                            
चलें दूर कहीं
छूती जहां
गगन चोटियां
चीरती
हृदय नदियां
मन
जो रम जाए
कदम
जहां थम जाए
आत्मा
तृप्त हो
तृष्णा
शांत हो
पीड़ा
जीवन की
काया
से मुक्त हो
लताएं
हरी भरी
धारा
बह रही
पीपल
डाल पर
कोयल
बोल रही
लौट कर
आऊं नहीं
छोड़कर
जाऊं नहीं
धरा
जो भा जाए
थकान
जो मिट जाए
सुकून
थोड़ा ही सही
जैसे
दूध और दही
वृक्ष
जो खाते नहीं
नदी
जो पीती नहीं
सागर
जो बोलते नहीं
दरिया
जो रुकते नहीं
दृश्य
मनोरम
आंखें
हुई नम
प्रकृति गोद में
बैठे अकेले
लताओं के जैसे
लगते मेले
आशा
जीवन की
लालसा
जीने की
भय
मृत्यु का
दुःख
शरीर का
अंत
कहानी का
आग
हवा पानी का
सत्य
एक ही नाम
चलें
परम धाम
बोलो
जय श्री राम
बोलो
जय श्री राम
2 महीने पहले
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