विज्ञापन

कान्हा और मेरा रूठना

Nag Mani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नाम नहीं भजूॅंगा तुम्हारा
        
                                                    
                            
नाम नहीं जपूॅंगा तुम्हारा
उदासीन बने रहते हो
देख कर भी देखा नहीं करते हो।

केशव-केशव नहीं पुकारूॅं
माधव-माधव नहीं पुकारूॅं
मधुसूदन भी नहीं पुकारूॅं
तुम अपने ही धुन में आनन्दित रहते हो।

कान्हा सपने में मिले एक दिन
बाज़ू पकड़ कर बोला, पकड़ मेरा हाथ
मैं ने कहा , जा-जा अब नहीं पकड़ूॅंगा
कान्हा ने हॅंस कर कहा,
अब छूटेगा कहाॅं !
मुरली की धुन है, मेरी
ताता-थैया भी है , मेरा
श्वास साधने की कला भी मेरी
मैंने कहा ,रूठने का हक मेरा है, कान्हा।

छवि नहीं हटती मन से तेरी
मुस्कान नहीं भूलाती तेरी
फिर भी भान होता है कभी-कभी
बड़े निष्ठुर हो कान्हा !
पर हाय रे ,मुस्कुराहट तुम्हारी
मन कहाॅं भूलाने देता है तुम को
मन कहाॅं भूलाने देता है तुम को।
-नाग मणि
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile