जिक्र क़र्ज़ का जोरों से चला
कोई कहानी, कोई अपना बखान सुनाने लगा
अचरज में रह गये
कहानी सीमित हो गई जब माल और मुद्रा पर।
हाॅं , बस एक लेन-देन की कहानी रह गई
समन्वय और सामंजस्य बैठाने का पथ बन गया
भावना और भाव नेपथ्य में रह गये
प्रतीत हुआ,मानवता और सदाचार ने अपनी भाषा भुला दिया।
समझ के परे हो गया
क्या करें, कैसे बतलायें
कैसे छुपायें व्यक्त करने से
वह दौर, वो क़र्ज़ का भाव, वो भावना
गिरता जब कोई अपने में
दर्द सब महसूस करते थे
चोट एक को लगती थी
ऑंसू सभी संगी-साथी के निकलते थे
भाव और भावनाओं का क़र्ज़
छूटता कहाॅं था, साथ-साथ लिए फिरते थे
साथ-साथ लिए फिरते थे
लिए फिरते थे।
-नाग मणि