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पापा का वो पुराना स्कूटर

mursaleen fatma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बगल की उस पुरानी पार्किंग में,
        
                                                    
                            
आज कुछ यूँ नज़र आ गया,
धूल में लिपटा वो पुराना स्कूटर,
जैसे बीता कल लौट आया।

नज़र हटती ही नहीं थी उससे,
दिल को जाने क्यों इतना भा गया,
लोहे का था वो एक वाहन मगर,
यादों का पूरा संसार बन गया।

वो स्कूटर बड़ा प्यारा था मुझे,
क्योंकि उस पर मेरे पापा सवार थे,
मेरी छोटी-सी दुनिया में तब,
वही मेरे सबसे बड़े किरदार थे।

पापा मुझे रोज़ घुमाते थे,
कभी पुलों की सैर कराते,
कभी पहाड़ों की राहों पर,
हँसते-हँसते मुझे ले जाते।

तब कहाँ गलियाँ इतनी भरी थीं,
न गाड़ियों का था इतना शोर,
हर स्कूटर अपनी कहानी कहता था,
हर सफ़र लगता था कुछ और।

हर किसी के घर कहाँ स्कूटर आते थे,
ये भी कभी शान हुआ करती थी,
जिनके आँगन में स्कूटर खड़ा हो,
उनकी अलग पहचान हुआ करती थी।

पापा मोहल्ले के दोस्तों को,
बारी-बारी पीछे बिठाते थे,
छोटी-सी उस सवारी में,
सबको पूरा शहर घुमाते थे।

किसी के चेहरे पर हँसी होती,
किसी की आँखों में सपने होते,
और लौटते हुए उस स्कूटर पर,
सबके दिल थोड़े अपने होते।

आज वही स्कूटर खामोश खड़ा है,
न पहिए घूमते हैं, न आवाज़ आती है,
मगर उसकी हर धूल की परत से,
पापा की जवानी नज़र आती है।

सोचती हूँ—वो दिन भी क्या दिन थे,
जब खुशियाँ बहुत छोटी हुआ करती थीं,
एक स्कूटर, कुछ अपने लोग,
और शामें कितनी बड़ी हुआ करती थीं।

आज साधन बहुत हैं दुनिया में,
मगर वो सुकून कहाँ से लाऊँ?
वो स्कूटर तो शायद फिर मिल जाए,
पर वो बचपन कहाँ से लाऊँ?

पापा के साथ बिताए वो पल,
आज भी दिल में जिंदा हैं,
वो स्कूटर भले ही पुराना हो गया,
पर उससे जुड़े रिश्ते आज भी नए हैं।

बस यूँ ही उस पार्किंग में खड़ा,
वो स्कूटर मुझे ये समझा गया—
कुछ चीज़ें पुरानी होकर भी,
हमारे दिल में हमेशा जवाँ रहती हैं। 
2 महीने पहले
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