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युगपुरुष हैं पेड़

Mukta singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब मैं छोटी थी,
        
                                                    
                            
माॅं फुर्सत से ले जाती उस पीपल की शीतल छाॅंव में,
जो मेरे दरवाज़े पर मुखिया के वज़ूद के रूप में खड़ा था।
माॅं का ऑंचल,पीपल की छाॅंव,शीतल मंद बयार,चबूतरे की सोंधी खुशबू।
मिलकर चौतरफा सुकून देते मुझे कि,मैं जन्नत महसूस करती।
एक दिन माॅं ने बताया था,
इसी पीपल की छाॅंव से होकर उनकी डोली ने गृह- प्रवेश किया था।
मैंने माॅं से पूछा था,"इसे किसने लगाया था?"
माॅं ने बताया था,"तेरे दादाजी ने बेटा!"
फिर मैं बड़ी हुई,मेरी डोली भी उसी पीपल की छाॅंव से गुज़र कर आगे बढ़ी।
आज भी मैं गाॅंव जाती हूॅं और पाती हूॅं पीपल को वहीं।।
अनेक झंझावातों का सामना करते हुए,वैसे ही ।
पल भर मैं ठिठकती हूॅं,पीपल से लिपट जाती हूॅं ।
याद करती हूॅं दादा - दादी के सुखद अहसास को।
माॅं-पिता की ममता व संरक्षण को ।
बरबस ही मुख से कह पड़ती हूॅं,अपने बच्चों से- वही सूत्र वाक्य -
जिसे मेरे दादाजी ने माॅं-पिताजी से कहा था।
माॅं-पिताजी ने मुझसे कहा था,
"यह पेड़ नहीं युगपुरुष हैं ! बड़े- बुजुर्ग हैं बेटा!इनकी रक्षा करना,सेवा करना।"
कल जब हम न होंगे तो इनकी सुखद छाॅंव के वरद हस्त के नीचे,
हमारी अनुभूति करना।
मेरे होनहार बच्चे बाॅंध लेते हैं,ज्ञान को अपनी थाती में,
मजबूती से अपनी अगली पीढ़ी को देने के लिए।

बस यही परंपरा-क्रम चलते जाना चाहिए सदियों तक।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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