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जब बात हो जगन्नाथ की

Mukta Pant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब बात हो जगन्नाथ की
        
                                                    
                            
कथा कुछ अनोखी सी
छवि अद्भुत मनमोहिनी
निराली मन में बसी।
मालवा के एक नृप
नाम उनका इन्द्रद्युम्न
नीलमाधव (श्रीहरि) की खोज में
अधीर कुछ भावविह्वल ।
दूत को नृप ने भेजा
नीलमाधव की खोज में
कृपा माधव की हुई
आदिवासी की गुफा में।
इन्द्रद्युम्न पहुँचे पुरी
मिला दारू जलधि में,
विश्वकर्मा आए धरा में
उद्देश्य मूर्तियां सृजन में।
शर्त विश्वकर्मा ने रखी
बन्द कक्ष करने की।
मूर्ति का सृजन न हो
तब तक द्वार न खोलने की।
हठ किया रानी ने
द्वार कक्ष का खुला
विश्वकर्मा ओझल हुए
सृजन अधूरा हुआ।
अधूरे हाथ ,
और है अधूरा शरीर
किन्तु श्रद्धा पूर्ण हो तो
भक्त पाए श्रीहरि।
निकसे जब भी रथ हरि का
गूंजे जग में जय- जयकार
छुए रथ की डोर को
हो जाए भवसागर पार,
कथा यही , यही है सार
पूर्ण वहीं जिसमें श्रद्धा अपार
देखें प्रभु मन के भाव
भक्ति ही सच्चा श्रृंगार
जय जगन्नाथ।
3 महीने पहले
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