कितनों को बतलाऊ मैं, मैं नहीं कलम मेरी लिखती है।
भाव चेतना मन में जागे, सोच शब्दों की शृंखला बन निज भाव को लिखती है हाँ….मैं नहीं कलम मेरी लिखती है।
अंजान शब्दों सा बना हूँ मैं, ब्यर्थ भावना पढ़ते हो, अन्नत कोटि के व्यभिचारो से बैठ सभा में सुनता हूँ,
धिक्कार उठा ये मन मानुस तब आत्मा मेरी कहती है,,
मैं नहीं कलम मेरी लिखती है।
किसको अच्छा किसको बुरा कह डालू मै,
सिरह उठा मन मेरा, काँप उठी धरती,
जब नारी की इज्जत लुटती है,,, तब
मैं नहीं कलम मेरी लिखती है ।
लिखने की आदत कैसी है मेरी, शायद मेरी मजबूरी होगी, बदलते दौर को देखा मैंने किसको कितना समझाऊ, जब शब्द नहीं भावुकता के मन की व्यथा सब कुछ कहती है….तब मैं नहीं कलम मेरी लिखती है ✍️