धुआँ है ज़िंदगी,
जो मिटने का नाम नहीं लेती,
हर पल बदलती रहती है,
मगर कभी ठहरती नहीं।
कभी मन कुछ पाने को बेचैन,
कभी मिला हुआ भी कम लगता है,
कभी सपनों की ऊँची उड़ान,
तो कभी हकीकत का गम लगता है।
कभी खुशी है, कभी उदासी,
कभी हँसी, कभी आँखों में नमी,
कभी अपने भी दूर लगते हैं,
कभी अजनबी बन जाते हैं हम ही।
वक्त हर पल कुछ कहता है,
मगर हम सुन नहीं पाते,
जो सामने होता है हमारे,
उसे छोड़कर कल में खो जाते।
कल क्या होगा—किसे पता?
आज भी तो पूरा अपना नहीं,
फिर क्यों आने वाले कल की चिंता,
जब बीता हुआ लौटता नहीं?
समय के साथ शरीर बदलता है,
मन भी बहुत कुछ सीखता है,
हर अनुभव जीवन की राह में
एक नया अध्याय लिखता है।
कुछ सपने पूरे हो जाते हैं,
कुछ अधूरे रह जाते हैं,
कुछ रिश्ते साथ निभाते हैं,
कुछ रास्ते में छूट जाते हैं।
मगर ज़िंदगी रुकती नहीं,
वक्त कभी पीछे मुड़ता नहीं।
गिरकर फिर उठना ही जीवन है,
हारकर भी मन टूटता नहीं।
जो पल आज हमारे पास है,
उसे यूँ ही व्यर्थ न जाने दें।
बीते कल को जाने दें पीछे,
आज को खुलकर जीने दें।
अपने वर्तमान को सँवारेंगे,
तो भविष्य खुद सँवर जाएगा।
मेहनत से बोया हुआ सपना
एक दिन सच बनकर आएगा।
इसलिए वक्त की कद्र करो,
हर पल को पहचानो तुम।
ज़िंदगी बहुत छोटी है,
इसे यूँ ही न गँवाओ तुम।
क्योंकि वक्त लौटकर नहीं आता,
और ज़िंदगी दोबारा नहीं मिलती।
जो करना है, आज ही कर लो—
हर सुबह रोज़ नहीं खिलती।
- सन्तोष कुमावत