रिश्ते यूं नहीं किए जाते दरकिनार!
हक़ीक़त तो ये है
इंसान साथ न हो तब भी,
यादें
रहती हैं साथ,
चंद स्वार्थ के मोहपाश में
आबद्ध होकर,
सच से मुंह मोड़ना
रिश्तों को भुलाना
आसान कैसे हो जाता ?
कैसे लोग दिखावे की दुनिया बना लेते?
कैसे आत्मीयता का ढोंग कर
फिर बाद में आंखें दिखाते हैं?
कैसे ?
आखिर कैसे?