विज्ञापन

वो दिन क्या सुहाने थे कच्चे मकान के

Mohd Usama

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो दिन क्या सुहाने थे कच्चे मकान के
        
                                                    
                            
साथ सभी रहते थे ऐशो आराम से

यूँ तो मुख्तलिफ लोग अबाद थे मगर
रहते थे सभी तब एक खानदान से

यूँ तो मकान सब के कच्चे ही थे मगर
दिल सब के ही बड़े आलीशान थे

गर स़ादिर हुई खता़ किसी एक फर्द से
तमाम एहले खाना ही पशेमान थे

छोटे बड़े के अदब से वाकि़फ था हर फर्द
तालीम ये सीखी इसी कच्चे मकान से

क़स्रो क़सूर सब ने बनाये अब मगर
दिल सब के हो गए कच्चे मकान से

रिश्तों की एहमियत से आरी है हर शख्स
उबूर कर गए हुदूद सारी एहतराम की

इस दोरे बेवफ़ा में अपना नहीं कोई
कैसे गुज़ारे जिंदगी अम्नो अमान की
-मोहम्मद उसामा नदवी
3 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Pandey

444 कविताएं

View Profile