वो दिन क्या सुहाने थे कच्चे मकान के
साथ सभी रहते थे ऐशो आराम से
यूँ तो मुख्तलिफ लोग अबाद थे मगर
रहते थे सभी तब एक खानदान से
यूँ तो मकान सब के कच्चे ही थे मगर
दिल सब के ही बड़े आलीशान थे
गर स़ादिर हुई खता़ किसी एक फर्द से
तमाम एहले खाना ही पशेमान थे
छोटे बड़े के अदब से वाकि़फ था हर फर्द
तालीम ये सीखी इसी कच्चे मकान से
क़स्रो क़सूर सब ने बनाये अब मगर
दिल सब के हो गए कच्चे मकान से
रिश्तों की एहमियत से आरी है हर शख्स
उबूर कर गए हुदूद सारी एहतराम की
इस दोरे बेवफ़ा में अपना नहीं कोई
कैसे गुज़ारे जिंदगी अम्नो अमान की
-मोहम्मद उसामा नदवी