माटी की मुरत है तू
करता है क्यूँ घमंड
माटी मे मिलना है सबको
मत कर तू हुडदंग
ईश्वर की रचना है सब
लीला उसकी न्यारी है
दुनिया को है गढ़ने वाला
हर चीजें उसकी प्यारी हैं
जीवन सबका ईश्वर के
पास पड़ा है अधीन
प्यार से रहना सीख लो
ऐ मानुष बुद्धिहीन
ईश्वर है एक काल स्वरूप
कण कण में वह व्याप्त है
दुखियों के दुख हरने की
हर शक्ति उनको प्राप्त है
धरती पर मानव जीवन का
कार्य सेवा ही चरितार्थ है
द्वेष धर्म का जीवन में
कोई नही परमार्थ है
सबकी सेवा सबको प्यार
मानुष का कर्तव्य है
वरना जीवन मानुष का
पूर्ण रुप से व्यर्थ हैं
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