जहां पर मैंने जन्म लिया , जहां मिला माँ का आँचल
जहां पिता की गोदी में ,मैंने ऊछलना सीखा
जहां सुनी दादी से लोरी ,बड़ी बहन संग चलना सीखा
जहां बड़े भाई से मैंने ,अच्छे से पढ़ना सीखा
वह जन्मस्थली शोहरतगढ़ है , जहां पर मैंने जन्म लिया
जब से हम सब बड़े हुए ,ज़िम्मेदारी बढ़ गयी
बचपन की मासूमियत ,ज़िम्मेदारी में बदल गए
चेहरे की मुस्कान की रंगत फिके पड़ गये
नौकरी के चक्कर में ,जब घर से दूर निकल गए
काम काज करते करते ,उलझनो में फँस गए
फ़ोन ही अब बातचीत का ,एकमात्र सहारा बन गया
जीवन मेरा अब तो एक उम्मीद का तारा बन गया
क्यों हो जाते हैं हम , अपनों से इतनी दूर
य़ा रब कुछ ऐसा कर , अपनों से हो मिलना भरपूर
कितनी मुसीबत ज़िन्दगी में झेलनी बाकी तस्वीर
ज़िन्दगी हो अच्छी मान धीरे धीरे बढ़ गए
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