ना प्रेम बुरा है
ना संसार बुरा है
इंसान का इंसान से
गलत व्यवहार बुरा है
धरती अपनी परिधि पर
गति से घूमा करती है
जो मन से हो जाए निर्बल
धरती पर उसका भार बुरा है
मिल जुल कर तुम सब से पूछो
उसका कुशल क्षेम
मलिन ह्रदय का धरती पर
जीवन विस्तार बुरा है
इस संसार की रचना में
बस ईश्वर की ही चलती है
जितना जल्दी समझ ले मानुष
वरना अंजाम बुरा है
जीवन कि तुम कद्र करो
प्यार से इसे बसर करो
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