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नज़र में जो हसीं मंज़र खड़े हैं

mohan lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नज़र में जो हसीं मंज़र खड़े हैं
        
                                                    
                            
ये बनकर फूल या पत्थर खड़े हैं

जो बाहर इस क़दर ख़ामोशियाँ हो
कि अंदर शोर के लश्कर खड़े हैं

अना कब तक भला साथ अपना देगी
मेरे दुश्मन तो सब बाहर खड़े हैं

तलाश-ए-ज़िंदगी में जाने वाले
सर-ए-राह आज भी बेघर खड़े हैं

उठा तू बोझ अपना ख़ुद ही ऐ दिल
कहाँ बस्ती में अब रहबर खड़े हैं
एक महीने पहले
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