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अब न कोई शिकवा है किसी से

Minakshi sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक सूनी सी राह पर,
        
                                                    
                            
मैंने एक साया देखा है,
जिसने खुशियों की महफ़िल में भी,
सिर्फ अकेलापन पाया है।

वो जो कभी हंसते थे खुलकर,
अब मुस्कुराहट से डरते हैं,
दिल के टूटे हुए टुकड़ों को,
पलकों में समेटे फिरते हैं।

उम्मीद की आख़िरी शमशानी लौ,
अश्कों की बारिश में बुझ गई,
जो अनकही सी कोई बात थी,
वो खामोशी के सन्नाटे में खो गई।

रिश्तों के उस कच्चे धागे को,
हम उम्र भर बुनते रह गए,
वो रेत का एक घरौंदा था,
हम पानी से बचाते रह गए।

अब न कोई शिकवा है किसी से,
न ही कोई नई आस है,
बस एक थमा हुआ सा मंज़र है,
और चारों तरफ़ सन्नाटा पास है।
13 घंटे पहले
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