जीवन में सबसे अधिक आघात वो नहीं देते
जो हमारे विरोध में खड़े होते हैं
बल्कि वो देते हैं...
जो भीतर चुपचाप जन्म लेते रहते हैं
रिपु एक विचार की तरह प्रवेश करता है
और धीरे-धीरे निर्णयों की धमनियों में उतरता है
और फिर मनुष्य को स्वयं से दूर कर देता है
क्रोध ..पहले न्याय का मुखौटा पहनता है
फिर आक्रोश में विवेक का वध करता है
अहंकार..कभी ऊँची आवाज़ में नहीं बोलता
बस उसे दूसरे की पीड़ा सुनाई देना बंद हो जाती है
ईर्ष्या..किसी और का सुख नहीं छीनती
वह हमारे भीतर का संतोष चुरा लेती है
रिपु रणभूमि में खड़ा कोई व्यक्ति नहीं
वो हमारे ही भीतर छिपे वो विकार हैं
जो बिना किसी शस्त्र के आघात कर सकते हैं
और बिना किसी युद्ध के पराजय लिख सकते हैं
रिपु कहीं बाहर नहीं, बल्कि
भीतर की वह मौन सहमति है
जो हमें धीरे-धीरे
हमसे ही अपरिचित बना देती है।।