नज़र के सामने जब वो हसीं गुलफ़ाम आता है
ख़िज़ाँ के दौर में भी मौसम-ए-बहार आता है
वो जब हँसकर गुज़रते हैं हमारी राह से अक्सर
तो हर ज़र्रे के होठों पर ख़ुशी का नाम आता है
गुलों को रश्क होता है उनकी सुर्ख़ रंगत पर
वो जब ज़ुल्फ़ें झटकते हैं, तो ढलती शाम होता है
मोहब्बत में मिले ज़ख़्मों को वो सहला ही देते हैं
मरीज़-ए-इश्क़ के हिस्से में जब आराम आता है
तड़प उठती है महफ़िल उनके बस इक बार आने से
लबों पर जब कभी भी नाम-ए-गुलफ़ाम आता है
- मीना गोपाल त्रिपाठी