हे घन! नभ के नीलाभ प्रांगण में कब होगा अमृत संचार
मेरी उर्वर उर-वीणा की, निस्तब्ध पड़ी है झंकार
शुष्क अधरों पर धूल जमी है कातर वनस्पति व्यथित खड़ी
प्राण-प्ररोहों की पलकों पर निद्रा भी अब लगती जड़ी
चातक की तृषित पुकार सुनो सरिताओं का बहता न नीर
हे मेघ!क्षितिज के पार से आ हर लो इस बेकल धरा की पीर
अपनी शीतल करुणा बरसा इस मौन सृजन को गति दे दो
जो जड़ता छाई पल्लव पर उसे फिर से नव जीवन दे दो
सुन विह्वल वसुधा का अनुनय अंबर का धीरज डोल गया
झंकार उठी फिर दिग-दिगंत जब मेघ मल्हार में बोल गया
अमिय-धार बरसाई जी भर तरु-तृण सब पुलकित हो आए
मिट गई पुरातन प्यास धरा की कण-कण फिर हरित हो गए
- मीना गोपाल त्रिपाठी