प्यार की मंज़िल मुझे हासिल नहीं है
क्या मेरा दिल प्यार के क़ाबिल नहीं है
कोशिशें की लाखों पर नाकाम हैं हम
नाख़ुदा मिलता हमें साहिल नहीं है
इस अदालत से सज़ा उसको मिली क्यों
जो हक़ीक़त में यहाँ क़ातिल नहीं है
मिल ही जायेगी मुझे मंज़िल सनम अब
साथ गर रब हों कोई मुश्किल नहीं है
देख के आँखें चुराते हैं सभी अब
ओहदा हमको कोई भी हासिल नहीं है
किससे शिकवा या शिकायत भी करें हम
बैठे क़ातिल हैं कोई बिस्मिल नहीं है
भूल बैठे सब नहीं अपना है कोई
मेरे ग़म में कोई भी शामिल नहीं है
ढ़ाई आखर प्रेम का मैंने पढ़ा पर
इश्क़ क्यों होता मेरा कामिल नहीं हैं
हैं मुक़ाबिल में मेरे कोई न मीना
क्या मेरे मेयार की महफ़िल नहीं है
-मीना भट्ट सिद्धार्थ