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नज़रें अब धुंधली सी हों चलीं

mayank vajpeyee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नज़रें अब धुंधली सी हों चलीं
        
                                                    
                            
दिखा रहीं हैं शायद उम्र जो ढलने को चली
हाथों को फिर भी ये अजीब सी ज़िद चढ़ी
उँगलियाँ चश्मे से मुँह फेरे खड़ी रहीं
डर लगता है शायद उन्हें कहीं अगर वो मान गईं
क्या होगा सपने दिखानी वाली नींद का
जो वो मेरी उम्र जान गईं
2 महीने पहले
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