नज़रें अब धुंधली सी हों चलीं
दिखा रहीं हैं शायद उम्र जो ढलने को चली
हाथों को फिर भी ये अजीब सी ज़िद चढ़ी
उँगलियाँ चश्मे से मुँह फेरे खड़ी रहीं
डर लगता है शायद उन्हें कहीं अगर वो मान गईं
क्या होगा सपने दिखानी वाली नींद का
जो वो मेरी उम्र जान गईं