यूँ ही लिख लिखकर फाड़ देते हैं ख़यालों को
काग़ज़ तक तो बात ही नहीं पहुँचती
यूँ ही मीलके पत्थरों से मिलकर लौट आते हैं शुरुआतों को
मंज़िलों से सफ़र की बात ही नहीं होती