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मंज़िलों से सफ़र की बात ही नहीं होती

mayank vajpeyee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यूँ ही लिख लिखकर फाड़ देते हैं ख़यालों को
        
                                                    
                            
काग़ज़ तक तो बात ही नहीं पहुँचती
यूँ ही मीलके पत्थरों से मिलकर लौट आते हैं शुरुआतों को
मंज़िलों से सफ़र की बात ही नहीं होती
2 घंटे पहले
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Prem Chandra

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