विज्ञापन

बड़ा डर लगता है उस ज़माने से

mayank vajpeyee

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बड़ा डर लगता है उस ज़माने से
        
                                                    
                            
मिलना पड़ेगा तुमसे किसी ढूंढे से बहाने से
अभी तक तारीख़ें शुक्र है वहाँ तलक पहुँची नहीं
तभी तो आ जाते हैं हम तुम बेझिझक एक दूसरे के बुलाने से
पर खिंची खींची सी तो लगती है आवाज़ें अब
कतराती नहीं वो अब ये जताने से
हौले से अनसुने हों चक्र हैं लफ़्ज़ हमारे
कहीं ना ऐस हु ना सुन सकें हम एक दूसरे को लाख सुनाने से
जानते हैं हम और जानते हो तुम भी ये
ना सिया इन अनजाने उधड़े धागों को
नहीं सम्भलेंगे ये रिश्ते फिर संभाले से
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all