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बड़ा डर लगता है उस ज़माने से

                
                                                         
                            बड़ा डर लगता है उस ज़माने से
                                                                 
                            
मिलना पड़ेगा तुमसे किसी ढूंढे से बहाने से
अभी तक तारीख़ें शुक्र है वहाँ तलक पहुँची नहीं
तभी तो आ जाते हैं हम तुम बेझिझक एक दूसरे के बुलाने से
पर खिंची खींची सी तो लगती है आवाज़ें अब
कतराती नहीं वो अब ये जताने से
हौले से अनसुने हों चक्र हैं लफ़्ज़ हमारे
कहीं ना ऐस हु ना सुन सकें हम एक दूसरे को लाख सुनाने से
जानते हैं हम और जानते हो तुम भी ये
ना सिया इन अनजाने उधड़े धागों को
नहीं सम्भलेंगे ये रिश्ते फिर संभाले से
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एक घंटा पहले

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