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तेरी ही मलकियत जिसमें, वो मेरा इक अकेला दिल है।

Master Abhay

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अलग ही नूर है उसमें, अदा की बात ही कुछ है,
        
                                                    
                            
मेरी हर साँस पर छाया, उसी का आज जादू है।
उड़ें ज़ुल्फ़ें तो लगता है, घिरी हो शाम सावन की,
वही महताब है मेरा, वही रौनक़ है आँगन की।
ओ मेरी हमनफ़स प्रशा, तुझी से रूह कामिल है,
तेरी ही मलकियत जिसमें, वो मेरा इक अकेला दिल है।

समुंदर सी हैं गहरी वो, निगाहें प्रेम से लबरेज़,
जिन्हें छू लूँ तो छा जाए, रगों में इक नशा सा तेज़।
लवों पर घुल रहा जैसे, किसी मीठे शहद का जाम,
फ़िदा जिस पर करें आशिक़, ख़ुशी से ज़िंदगी तमाम।
उठे जो इक नज़र उसकी, ठहर जाए जहाँ सारा,
बिन बोले ही कह जाता, बहुत कुछ हुस्न का इशारा।

बड़ी मासूम सी रंगत, बड़ी भोली है वो सूरत,
तसव्वुर में जो उतरी थी, वही तो प्रीत की मूरत।
सुलगते दिल को मेरे हर, घड़ी राहत वो देती है,
धड़कते इस मेरे सीने में, उसकी हँसी ही रहती है।
ज़रा सा देखकर मुझको, जो वो लब मुस्कुराते हैं,
तड़प उठता है दिल मेरा, ये दम ही थम से जाते हैं।

बड़ी कातिल अदा से जब, क़दम वो नाज़ से धरती,
फ़रेबी चाल वो उसकी, जिगर पर घाव है करती।
ये मीठे ज़ख़्म भी मुझको, सुकूँ हर बार देते हैं,
उसी की याद के साये, मुझे आगोश लेते हैं।
ओ मेरी हमनफ़स प्रशा, तुझी से रूह कामिल है,
तेरी ही मलकियत जिसमें, वो मेरा इक अकेला दिल है।
3 घंटे पहले
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