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क्या ये इश्क़ जरूरी था

Masroor Alam

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अक्सर अकेला यही सोचता हूं
        
                                                    
                            
क्या तुम्हारा मिलना जरूरी था

चलो मिल गए कोई हर्ज नहीं
फिर मिल कर बिछड़ना जरूरी था

जब तुम्हारे बाल लहराते हवा में
उन जुल्फों में उलझना ज़रूरी था

जब तुम घूर कर देखा करती थी
क्या उन आंंखों में पानी था
तुम चली गई थी बिन एक बार पलटे
तेरे क़दमों के निशान दुढ़ना जरूरी था

जाते हुए अपनी यादें छोड़ कर चली गई
फिर मेरा तेरी यादों में रोना जरूरी था

साथ रहना नहीं था तो बता देते
इस तरह चले जाना ज़रूरी था

तुम्हें ये खेल पसंद है कहा तो होता
यूं हंसा कर रुलाना जरूरी था

तुम्हे इश्क़ नहीं इनकार तो लिए होते
बेवजह इश्क़ जताना जरूरी था

तू मौत कहती हम मर जाते
ऐसे खंजर छिपाना जरूरी था

तुझे ये गद्दारी मुझ ही से करनी थी
मेरे दिल का ठिकाना ज़रूरी था

इश्क़ तो आंखे बंद कर के करते हैं
तुम्हारा नकाब लगाना जरूरी था

तुम्हें मालूम है हम नशा नहीं करते
आंखों से जाम पिलाना ज़रूरी था

जो बात थी बात देते सुलह कर लेते
बिन बताए चले जाना जरूरी था

मैं आज भी देर रात यही सोचता हूं
क्या मुझे इश्क़ होना ज़रूरी था


 हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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