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क्या ये इश्क़ जरूरी था

                
                                                         
                            अक्सर अकेला यही सोचता हूं
                                                                 
                            
क्या तुम्हारा मिलना जरूरी था

चलो मिल गए कोई हर्ज नहीं
फिर मिल कर बिछड़ना जरूरी था

जब तुम्हारे बाल लहराते हवा में
उन जुल्फों में उलझना ज़रूरी था

जब तुम घूर कर देखा करती थी
क्या उन आंंखों में पानी था
तुम चली गई थी बिन एक बार पलटे
तेरे क़दमों के निशान दुढ़ना जरूरी था

जाते हुए अपनी यादें छोड़ कर चली गई
फिर मेरा तेरी यादों में रोना जरूरी था

साथ रहना नहीं था तो बता देते
इस तरह चले जाना ज़रूरी था

तुम्हें ये खेल पसंद है कहा तो होता
यूं हंसा कर रुलाना जरूरी था

तुम्हे इश्क़ नहीं इनकार तो लिए होते
बेवजह इश्क़ जताना जरूरी था

तू मौत कहती हम मर जाते
ऐसे खंजर छिपाना जरूरी था

तुझे ये गद्दारी मुझ ही से करनी थी
मेरे दिल का ठिकाना ज़रूरी था

इश्क़ तो आंखे बंद कर के करते हैं
तुम्हारा नकाब लगाना जरूरी था

तुम्हें मालूम है हम नशा नहीं करते
आंखों से जाम पिलाना ज़रूरी था

जो बात थी बात देते सुलह कर लेते
बिन बताए चले जाना जरूरी था

मैं आज भी देर रात यही सोचता हूं
क्या मुझे इश्क़ होना ज़रूरी था


 हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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