समझ और उम्मीद का अजीब रिश्ता है
समझ आते ही उम्मीदों का रंग पड़ जाता है फीका ,
जैसे शाम ढलते ही सूरज का
जो दिन में उजाला करता , शाम होते ही छिप जाता है॥
समझ जितनी बढ़ती है,
उम्मीदें उतनी ही कम होने लगती हैं।
क्योंकि हर चेहरे के पीछे,
हमें अब हकीकत दिखने लगती है
पहले होती थी उम्मीदें बड़ी-बड़ी ,
जैसे पाना हो आसमान सारा
जब समझ आई तो पता चला,
सुकून मिलता है अकेले चलने में ॥
अब आई समझ तो ,
उम्मीदें शोर नहीं करती॥
क्योंकि अब टूटकर संभलना आ गया ,
ठोकरों से जो चलना आ गया ॥