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समझ और उम्मीद

Manshi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समझ और उम्मीद का अजीब रिश्ता है
        
                                                    
                            
समझ आते ही उम्मीदों का रंग पड़ जाता है फीका ,
जैसे शाम ढलते ही सूरज का
जो दिन में उजाला करता , शाम होते ही छिप जाता है॥

समझ जितनी बढ़ती है,
उम्मीदें उतनी ही कम होने लगती हैं।
क्योंकि हर चेहरे के पीछे,
हमें अब हकीकत दिखने लगती है

पहले होती थी उम्मीदें बड़ी-बड़ी ,
जैसे पाना हो आसमान सारा
जब समझ आई तो पता चला,
सुकून मिलता है अकेले चलने में ॥

अब आई समझ तो ,
उम्मीदें शोर नहीं करती॥
क्योंकि अब टूटकर संभलना आ गया ,
ठोकरों से जो चलना आ गया ॥

 
2 महीने पहले
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